जब कोई भी संस्था इतनी बड़ी हो जाती है कि, उसके द्वारा किया हुवा प्रत्येक कार्य उसका मुख्य कार्य सा दिखाई पड़ने लगता है। सुखद स्तिथि यह है कि, हमारे पास अपना संविधान है, अपना दर्शन है। जिसके अनुरूप हम कार्य करते है। समय समय पड़ हम अपने प्रोजेक्ट स्थान और समय अनुरूप करते है। पर जब संस्था के प्रोजेक्ट समाज के स्वार्थ सिद्धि के अनुरूप नही होते तब वे अपना महत्व खो बैठते है। अभी हम ऐसी जगह खड़े है, जहा से कई रस्ते जाते है। कुछ अंतरास्ट्रीय संस्था की तरफ़ जाते है, तो कुछ हमारे राजनेताओ के स्वार्थ्सिधि की तरफ़ हमे ले जाते है। कुछ रस्ते हमे आनंद देने वाले होते है। हम आसानी से उन पर चल देते है। पर यह अभी तक तय नही है कि युवा मंच को कौन से कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जबके हमे हमारे संविधान ने हमें हर कार्य को करने या न करने कि छुट दे राखी है । पर हमें यह नजर नही आता, और हम उन कार्यक्रमों को हाथ में लेने लग जाते है, जिन से समाज का कोई हित नही होता, पर आयोजको को इसमे भरी खुसी होती है, और कार्यक्रम आयोजित हो जाता है.....जारी......
रवि अजितसरिया,
गुवाहाटी
रविवार, 30 नवंबर 2008
हम क्या करे और क्या ना करे ?
जब कोई भी संस्था इतनी बड़ी हो जाती है कि, उसके द्वारा किया हुवा प्रत्येक कार्य उसका मुख्य कार्य सा दिखाई पड़ने लगता है। सुखद स्तिथि यह है कि, हमारे पास अपना संविधान है, अपना दर्शन है। जिसके अनुरूप हम कार्य करते है। समय समय पड़ हम अपने प्रोजेक्ट स्थान और समय अनुरूप करते है। पर जब संस्था के प्रोजेक्ट समाज के स्वार्थ सिद्धि के अनुरूप नही होते तब वे अपना महत्व खो बैठते है। अभी हम ऐसी जगह खड़े है, जहा से कई रस्ते जाते है। कुछ अंतरास्ट्रीय संस्था की तरफ़ जाते है, तो कुछ हमारे राजनेताओ के स्वार्थ्सिधि की तरफ़ हमे ले जाते है। कुछ रस्ते हमे आनंद देने वाले होते है। हम आसानी से उन पर चल देते है। पर यह अभी तक तय नही है कि युवा मंच को कौन से कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जबके हमे हमारे संविधान ने हमें हर कार्य को करने या न करने कि छुट दे राखी है । पर हमें यह नजर नही आता, और हम उन कार्यक्रमों को हाथ में लेने लग जाते है, जिन से समाज का कोई हित नही होता, पर आयोजको को इसमे भरी खुसी होती है, और कार्यक्रम आयोजित हो जाता है.....जारी......
रवि अजितसरिया,
गुवाहाटी
रवि अजितसरिया,
गुवाहाटी
मंच की दिशा और दशा ?
इस ब्लॉग का उद्देश्य मंच की दिशा और दशा पर चर्चा करना है. जो यात्रा २३ साल पहले शुरू हुई थी वोह किस मुकाम तक पहुँची है. आज सुबह के अखबार में देखा मारवारी युवा मंच मुंबई में मारे गए निर्दोष लोगो तथा सहीदो तो श्रधांजलि देने के लिए सभा का आयोजन कर रही है. यह अच्छा है परन्तु क्या यहीं तक हमारा दायित्व है. सामाजिक सेवा कार्यो में हमारा कोई सानी नहीं है. मारवारी युवा मंच की पहचान आम मारवारी में इससे अधिक भी नहीं है. ना तो सामाजिक बुरइयो के पर क़तर पाई है ना ही राजनीती में अपने बूते दो चार सांसद भेजने की कुब्बत हासिल कर पाई है।
पिछले दिनों मुझे श्री संकरदेव नेत्र्यालय में नेत्र दान पखवारे में भाग लेने का मौका मिला। एक साल में कुल ४३ लोगो ने नेत्र दान किया था. मेरे पास ३६ लोगो की सूचि थी जिसमे से ३० लोग मारवारी थे. अगर यह गुवाहाटी का आंकडा है तो पुरे देश में स्तिथि क्या होगी. मारवारी समाज की जनसँख्या की ठीक ठीक जानकारी हमारे पास नही है। ना ही हमारे पास मरवारियो द्वारा किए गए व्यक्तिगत सामाजिक कार्यो के आकडे है।
पिछले दिनों मुझे श्री संकरदेव नेत्र्यालय में नेत्र दान पखवारे में भाग लेने का मौका मिला। एक साल में कुल ४३ लोगो ने नेत्र दान किया था. मेरे पास ३६ लोगो की सूचि थी जिसमे से ३० लोग मारवारी थे. अगर यह गुवाहाटी का आंकडा है तो पुरे देश में स्तिथि क्या होगी. मारवारी समाज की जनसँख्या की ठीक ठीक जानकारी हमारे पास नही है। ना ही हमारे पास मरवारियो द्वारा किए गए व्यक्तिगत सामाजिक कार्यो के आकडे है।
मंच की दिशा और दशा ?
इस ब्लॉग का उद्देश्य मंच की दिशा और दशा पर चर्चा करना है. जो यात्रा २३ साल पहले शुरू हुई थी वोह किस मुकाम तक पहुँची है. आज सुबह के अखबार में देखा मारवारी युवा मंच मुंबई में मारे गए निर्दोष लोगो तथा सहीदो तो श्रधांजलि देने के लिए सभा का आयोजन कर रही है. यह अच्छा है परन्तु क्या यहीं तक हमारा दायित्व है. सामाजिक सेवा कार्यो में हमारा कोई सानी नहीं है. मारवारी युवा मंच की पहचान आम मारवारी में इससे अधिक भी नहीं है. ना तो सामाजिक बुरइयो के पर क़तर पाई है ना ही राजनीती में अपने बूते दो चार सांसद भेजने की कुब्बत हासिल कर पाई है।
पिछले दिनों मुझे श्री संकरदेव नेत्र्यालय में नेत्र दान पखवारे में भाग लेने का मौका मिला। एक साल में कुल ४३ लोगो ने नेत्र दान किया था. मेरे पास ३६ लोगो की सूचि थी जिसमे से ३० लोग मारवारी थे. अगर यह गुवाहाटी का आंकडा है तो पुरे देश में स्तिथि क्या होगी. मारवारी समाज की जनसँख्या की ठीक ठीक जानकारी हमारे पास नही है। ना ही हमारे पास मरवारियो द्वारा किए गए व्यक्तिगत सामाजिक कार्यो के आकडे है।
पिछले दिनों मुझे श्री संकरदेव नेत्र्यालय में नेत्र दान पखवारे में भाग लेने का मौका मिला। एक साल में कुल ४३ लोगो ने नेत्र दान किया था. मेरे पास ३६ लोगो की सूचि थी जिसमे से ३० लोग मारवारी थे. अगर यह गुवाहाटी का आंकडा है तो पुरे देश में स्तिथि क्या होगी. मारवारी समाज की जनसँख्या की ठीक ठीक जानकारी हमारे पास नही है। ना ही हमारे पास मरवारियो द्वारा किए गए व्यक्तिगत सामाजिक कार्यो के आकडे है।
गुरुवार, 27 नवंबर 2008
प्रस्ताव क्यों-2
प्रस्ताव सम्बंधित अपने प्रथम अंक में मैंने एक सवाल किया था- क्या इसका यह अर्थ निकला जाए कि प्रतिनिधि सभा सीधे सदन में आए प्रस्तावों पर चर्चा नहीं कर सकती ? इसका उत्तर किसी पाठक ने नहीं दिया। मेरा उत्तर तो यही है - कर सकती है।
दुसरे लेख में हम प्रस्तावों की प्रासंगिकता पर चर्चा कर रहे थे। शाखाओं द्वारा दिए जाने वाले प्रस्तावों पर बात अधूरी रह गयी थी। शाखाएं भी यदि सदस्यों (?) के नाम से अपने प्रस्ताव रा० सभा में भेज दें तो फिर प्रतिनिधि सभा में शाखाओं के प्रस्तावों की कोई जरूरत नहीं रहती।
हाँ एक बात और है कि शाखा को रा० सभा में अपने नाम से प्रस्ताव भेजने का कोई अधिकार नहीं दिया हुवा है, पर शाखा द्वारा मनोनीत सदस्य रा० सभा में प्रस्ताव रख सकते हैं।
साधारण सदस्य:-
यदि धारा १५ (उ ) में लिखे 'सदस्य' शब्द को धारा २६ (e) में लिखे 'सदस्य' शब्द के सामान ही पढ़ा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि साधारण सदस्य अपना प्रस्ताव दोनों यानि रा० सभा एवं प्रतिनिधि सभा में भेज सकता है। यानी सदस्यों के प्रस्तावों पर रा० सभा में चर्चा हो सकती है।
दुसरे शब्दों में देखा जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि अधिवेसन की प्रतिनिधि सभा के वजाय प्रस्ताव सम्बंधित सारे कार्य रा० सभा में पुरे किए जा सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा है? जी नहीं।
प्रतिनिधि सभा में पारित किए जाने वाले प्रस्तावों की अपनी अहमियत है। समझने की बात यह है कि रा० सभा में मंच की सामान्य नीतियों के सम्बन्ध में प्रस्ताव गृहीत किए जा सकते हैं, और प्रतिनिधि सभा में extra ordinary प्रस्ताव भी पारित किए जा सकते हैं। मेरे विचार से प्रतिनिधि में सिर्फ़ ऐसे प्रस्तावों पर ही चर्चा होनी चाहिए, जो कि मंच की नीति सम्बंधित हो और जिन प्रस्तावों का सम्बन्ध व्यापक समाज से हो। कुछ लोग यह मानते हैं कि प्रतिनिधि सभा में लोक दिखाऊ प्रस्ताव लिए जाने चाहिए- और मैं उन लोगो से असहमत नहीं हूँ।
राज कुमार शर्मा
दुसरे लेख में हम प्रस्तावों की प्रासंगिकता पर चर्चा कर रहे थे। शाखाओं द्वारा दिए जाने वाले प्रस्तावों पर बात अधूरी रह गयी थी। शाखाएं भी यदि सदस्यों (?) के नाम से अपने प्रस्ताव रा० सभा में भेज दें तो फिर प्रतिनिधि सभा में शाखाओं के प्रस्तावों की कोई जरूरत नहीं रहती।
हाँ एक बात और है कि शाखा को रा० सभा में अपने नाम से प्रस्ताव भेजने का कोई अधिकार नहीं दिया हुवा है, पर शाखा द्वारा मनोनीत सदस्य रा० सभा में प्रस्ताव रख सकते हैं।
साधारण सदस्य:-
यदि धारा १५ (उ ) में लिखे 'सदस्य' शब्द को धारा २६ (e) में लिखे 'सदस्य' शब्द के सामान ही पढ़ा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि साधारण सदस्य अपना प्रस्ताव दोनों यानि रा० सभा एवं प्रतिनिधि सभा में भेज सकता है। यानी सदस्यों के प्रस्तावों पर रा० सभा में चर्चा हो सकती है।
प्रांतीय सभा
अब आते हैं, प्रांतीय सभा के प्रस्तावों पर। शाखाओं की तरह प्रांतीय सभा को भी यह अधिकार नहीं हैं कि अपने प्रस्ताव राष्ट्रीय सभा में रख सके। लेकिन प्रांतीय सभा चाहे तो प्र० अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, अथवा महामंत्री के नाम से प्रांतीय सभा के प्रस्ताव रा० सभा में उठा सकती है।
दुसरे शब्दों में देखा जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि अधिवेसन की प्रतिनिधि सभा के वजाय प्रस्ताव सम्बंधित सारे कार्य रा० सभा में पुरे किए जा सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा है? जी नहीं।
प्रतिनिधि सभा में पारित किए जाने वाले प्रस्तावों की अपनी अहमियत है। समझने की बात यह है कि रा० सभा में मंच की सामान्य नीतियों के सम्बन्ध में प्रस्ताव गृहीत किए जा सकते हैं, और प्रतिनिधि सभा में extra ordinary प्रस्ताव भी पारित किए जा सकते हैं। मेरे विचार से प्रतिनिधि में सिर्फ़ ऐसे प्रस्तावों पर ही चर्चा होनी चाहिए, जो कि मंच की नीति सम्बंधित हो और जिन प्रस्तावों का सम्बन्ध व्यापक समाज से हो। कुछ लोग यह मानते हैं कि प्रतिनिधि सभा में लोक दिखाऊ प्रस्ताव लिए जाने चाहिए- और मैं उन लोगो से असहमत नहीं हूँ।
राज कुमार शर्मा
प्रस्ताव क्यों-2
प्रस्ताव सम्बंधित अपने प्रथम अंक में मैंने एक सवाल किया था- क्या इसका यह अर्थ निकला जाए कि प्रतिनिधि सभा सीधे सदन में आए प्रस्तावों पर चर्चा नहीं कर सकती ? इसका उत्तर किसी पाठक ने नहीं दिया। मेरा उत्तर तो यही है - कर सकती है।
दुसरे लेख में हम प्रस्तावों की प्रासंगिकता पर चर्चा कर रहे थे। शाखाओं द्वारा दिए जाने वाले प्रस्तावों पर बात अधूरी रह गयी थी। शाखाएं भी यदि सदस्यों (?) के नाम से अपने प्रस्ताव रा० सभा में भेज दें तो फिर प्रतिनिधि सभा में शाखाओं के प्रस्तावों की कोई जरूरत नहीं रहती।
हाँ एक बात और है कि शाखा को रा० सभा में अपने नाम से प्रस्ताव भेजने का कोई अधिकार नहीं दिया हुवा है, पर शाखा द्वारा मनोनीत सदस्य रा० सभा में प्रस्ताव रख सकते हैं।
साधारण सदस्य:-
यदि धारा १५ (उ ) में लिखे 'सदस्य' शब्द को धारा २६ (e) में लिखे 'सदस्य' शब्द के सामान ही पढ़ा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि साधारण सदस्य अपना प्रस्ताव दोनों यानि रा० सभा एवं प्रतिनिधि सभा में भेज सकता है। यानी सदस्यों के प्रस्तावों पर रा० सभा में चर्चा हो सकती है।
दुसरे शब्दों में देखा जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि अधिवेसन की प्रतिनिधि सभा के वजाय प्रस्ताव सम्बंधित सारे कार्य रा० सभा में पुरे किए जा सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा है? जी नहीं।
प्रतिनिधि सभा में पारित किए जाने वाले प्रस्तावों की अपनी अहमियत है। समझने की बात यह है कि रा० सभा में मंच की सामान्य नीतियों के सम्बन्ध में प्रस्ताव गृहीत किए जा सकते हैं, और प्रतिनिधि सभा में extra ordinary प्रस्ताव भी पारित किए जा सकते हैं। मेरे विचार से प्रतिनिधि में सिर्फ़ ऐसे प्रस्तावों पर ही चर्चा होनी चाहिए, जो कि मंच की नीति सम्बंधित हो और जिन प्रस्तावों का सम्बन्ध व्यापक समाज से हो। कुछ लोग यह मानते हैं कि प्रतिनिधि सभा में लोक दिखाऊ प्रस्ताव लिए जाने चाहिए- और मैं उन लोगो से असहमत नहीं हूँ।
राज कुमार शर्मा
दुसरे लेख में हम प्रस्तावों की प्रासंगिकता पर चर्चा कर रहे थे। शाखाओं द्वारा दिए जाने वाले प्रस्तावों पर बात अधूरी रह गयी थी। शाखाएं भी यदि सदस्यों (?) के नाम से अपने प्रस्ताव रा० सभा में भेज दें तो फिर प्रतिनिधि सभा में शाखाओं के प्रस्तावों की कोई जरूरत नहीं रहती।
हाँ एक बात और है कि शाखा को रा० सभा में अपने नाम से प्रस्ताव भेजने का कोई अधिकार नहीं दिया हुवा है, पर शाखा द्वारा मनोनीत सदस्य रा० सभा में प्रस्ताव रख सकते हैं।
साधारण सदस्य:-
यदि धारा १५ (उ ) में लिखे 'सदस्य' शब्द को धारा २६ (e) में लिखे 'सदस्य' शब्द के सामान ही पढ़ा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि साधारण सदस्य अपना प्रस्ताव दोनों यानि रा० सभा एवं प्रतिनिधि सभा में भेज सकता है। यानी सदस्यों के प्रस्तावों पर रा० सभा में चर्चा हो सकती है।
प्रांतीय सभा
अब आते हैं, प्रांतीय सभा के प्रस्तावों पर। शाखाओं की तरह प्रांतीय सभा को भी यह अधिकार नहीं हैं कि अपने प्रस्ताव राष्ट्रीय सभा में रख सके। लेकिन प्रांतीय सभा चाहे तो प्र० अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, अथवा महामंत्री के नाम से प्रांतीय सभा के प्रस्ताव रा० सभा में उठा सकती है।
दुसरे शब्दों में देखा जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि अधिवेसन की प्रतिनिधि सभा के वजाय प्रस्ताव सम्बंधित सारे कार्य रा० सभा में पुरे किए जा सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा है? जी नहीं।
प्रतिनिधि सभा में पारित किए जाने वाले प्रस्तावों की अपनी अहमियत है। समझने की बात यह है कि रा० सभा में मंच की सामान्य नीतियों के सम्बन्ध में प्रस्ताव गृहीत किए जा सकते हैं, और प्रतिनिधि सभा में extra ordinary प्रस्ताव भी पारित किए जा सकते हैं। मेरे विचार से प्रतिनिधि में सिर्फ़ ऐसे प्रस्तावों पर ही चर्चा होनी चाहिए, जो कि मंच की नीति सम्बंधित हो और जिन प्रस्तावों का सम्बन्ध व्यापक समाज से हो। कुछ लोग यह मानते हैं कि प्रतिनिधि सभा में लोक दिखाऊ प्रस्ताव लिए जाने चाहिए- और मैं उन लोगो से असहमत नहीं हूँ।
राज कुमार शर्मा
प्रस्ताव क्यों?
पिछले लेख में हमने यह जाना कि पर्तिनिधि सभा हेतु प्रस्ताव किसके द्वारा और कैसे भेजा जा सकता है। आज का बिषय है- प्रस्ताव क्यों भेजे जातें हैं?
राष्ट्रीय सभा :-
सर्वप्रथम हम देखें कि राष्ट्रीय सभा भी प्रतिनिधि सभा हेतु प्रस्ताव भेज सकती है। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि ऐसे कौन से प्रस्ताव है, जिसे राष्ट्रीय सभा स्वयं पारित नहीं कर सकती है और जिन्हें सिर्फ़ प्रतिनिधि सभा ही पारित कर सकती है? यदि, आप पाठक गण इस बिषय पर रोशनी डालें तो मैं आभारी रहूँगा। ध्यान दें कि प्रतिनिधि सभा में मतदान करने का अधिकार सिर्फ़ शाखाओं के मुख्य प्रतिनिधियों को ही है।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति:-
राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति भी प्रतिनिधि सभा हेतु प्रस्ताव भेज सकती है। यहाँ भी मैं थोड़ा (?) confused हूँ कि जब रा० का० स० अपने प्रस्ताव (यदि ऐसे कोई प्रस्ताव हो जिस पर बिना रा० सभा या प्रतिनिधि सभा में पारित करवाए बिना कार्य करना सम्भव न हो तो) अपने प्रस्ताव रा० सभा में रख सकती है और रा० सभा से पारित करवा सकती है, तो फिर प्रतिनिधि सभा में प्रस्ताव रखने कि क्या आवश्यकता पड़ सकती है? किसी साथी नें बताया कि रा० सभा द्वारा rejected प्रस्ताव रा० का० स०, प्रतिनिधि सभा में रख सकती है। अगर इस बात को सही माने तो एक सवाल फिर खड़ा होता है, वो यह है कि क्या प्रतिनिधि सभा रा० सभा द्वारा अस्वीकृत प्रस्तावों पर चर्चा कर सकती है? दोनों सभाओं में मतदाताओं की तुलना करें, तो यह सवाल अप्रासंगिक नहीं रह जाता है।
शाखा
अब आते हैं शाखाओं द्वारा दिए जाने वाले प्रस्तावों पर। अधिवेशन आते ही शाखाओं पर नेतृत्व एवं वरिस्ष्ठ सदस्यों द्वारा प्रस्ताव भेजे जाने हेतु दबाब बनने कि प्रक्रिया भी शरु हो जाती है। समझ में यह नहीं आता कि प्रस्तावों को इतना महत्व राष्ट्रीय सभा के वक्त क्यों नहीं दिया जाता?
जारी
राज कुमार शर्मा
राष्ट्रीय सभा :-
सर्वप्रथम हम देखें कि राष्ट्रीय सभा भी प्रतिनिधि सभा हेतु प्रस्ताव भेज सकती है। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि ऐसे कौन से प्रस्ताव है, जिसे राष्ट्रीय सभा स्वयं पारित नहीं कर सकती है और जिन्हें सिर्फ़ प्रतिनिधि सभा ही पारित कर सकती है? यदि, आप पाठक गण इस बिषय पर रोशनी डालें तो मैं आभारी रहूँगा। ध्यान दें कि प्रतिनिधि सभा में मतदान करने का अधिकार सिर्फ़ शाखाओं के मुख्य प्रतिनिधियों को ही है।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति:-
राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति भी प्रतिनिधि सभा हेतु प्रस्ताव भेज सकती है। यहाँ भी मैं थोड़ा (?) confused हूँ कि जब रा० का० स० अपने प्रस्ताव (यदि ऐसे कोई प्रस्ताव हो जिस पर बिना रा० सभा या प्रतिनिधि सभा में पारित करवाए बिना कार्य करना सम्भव न हो तो) अपने प्रस्ताव रा० सभा में रख सकती है और रा० सभा से पारित करवा सकती है, तो फिर प्रतिनिधि सभा में प्रस्ताव रखने कि क्या आवश्यकता पड़ सकती है? किसी साथी नें बताया कि रा० सभा द्वारा rejected प्रस्ताव रा० का० स०, प्रतिनिधि सभा में रख सकती है। अगर इस बात को सही माने तो एक सवाल फिर खड़ा होता है, वो यह है कि क्या प्रतिनिधि सभा रा० सभा द्वारा अस्वीकृत प्रस्तावों पर चर्चा कर सकती है? दोनों सभाओं में मतदाताओं की तुलना करें, तो यह सवाल अप्रासंगिक नहीं रह जाता है।
शाखा
अब आते हैं शाखाओं द्वारा दिए जाने वाले प्रस्तावों पर। अधिवेशन आते ही शाखाओं पर नेतृत्व एवं वरिस्ष्ठ सदस्यों द्वारा प्रस्ताव भेजे जाने हेतु दबाब बनने कि प्रक्रिया भी शरु हो जाती है। समझ में यह नहीं आता कि प्रस्तावों को इतना महत्व राष्ट्रीय सभा के वक्त क्यों नहीं दिया जाता?
जारी
राज कुमार शर्मा
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